उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bahut din ho gae dariya ki jaanib aa nahin pae

बहुत दिन हो गए दरिया की जानिब आ नहीं पाए

بہت دن ہو گئے دریا کی جانب آ نہیں پائے

शायर: Idris Babar5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बहुत दिन हो गए दरिया की जानिब आ नहीं पाए
परिंदो ख़ैर से तो हो कि पर फैला नहीं पाए

गई गुज़री सहर शामें मगर वीराना-ए-जाँ में
खिले कुछ फूल ऐसे जो कभी मुरझा नहीं पाए

जनाब अब ज़ेर-ए-आब आराम से देखें अछूते ख़्वाब
जो इन मटमैली आँखों से तो हक़ मनवा नहीं पाए

बरसती है कभी आग और कभी पानी उमडता है
मगर ये हाथ हैं जो आसमाँ तक जा नहीं पाए

अब इस दिल ही को लो आराम क्यों इस को नहीं आता
यही तो बात है जो हम तुम्हें समझा नहीं पाए