उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo gham de rahe hain KHushi ho rahi hai

वो ग़म दे रहे हैं ख़ुशी हो रही है

وہ غم دے رہے ہیں خوشی ہو رہی ہے

शायर: Kaif Moradaabadi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो ग़म दे रहे हैं ख़ुशी हो रही है
हक़ीक़त में अब आशिक़ी हो रही है

अभी मोहतसिब मय-कदे में न आएँ
ठहर जाइए मय-कशी हो रही है

मोहब्बत में कितने ही मंसूर गुम हैं
ख़ुदी भी यहाँ बे-ख़ुदी हो रही है

न ज़ौक़-ए-तलब है न एहसास-ए-मंज़िल
ये जीना है या ख़ुद-कुशी हो रही है

कोई जुरअतें देखे अहल-ए-हवस की
मोहब्बत से भी दिल लगी हो रही है

ये मय-ख़ाने में किस का पैमाना छलका
बहुत दूर तक रौशनी हो रही है

न पूछो यगानों की बेगानगी को
ये सब दोस्त में दोस्ती हो रही है

अजब आलम-ए-'कैफ़' है बज़्म-ए-जानाँ
निगाहों से भी बंदगी हो रही है