उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo fart-e-bekasi hai ki ab kya kahen jise

वो फ़र्त-ए-बेकसी है कि अब क्या कहें जिसे

وہ فرط بیکسی ہے کہ اب کیا کہیں جسے

शायर: Jaleel Qidwai8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो फ़र्त-ए-बेकसी है कि अब क्या कहें जिसे
इतना नहीं है कोई कि अपना कहें जिसे

पाने लगा है लुत्फ़-ए-ख़लिश हाए बे-हिसी
वो दिल कि हिस्सियात की दुनिया कहें जिसे

हर पर्दा-ए-हिजाब में ऐ हुस्न-बे-नक़ाब
देखा है यूँ तुझे कि न देखा कहें जिसे

क्या शान-ए-इल्तिफ़ात है उस बर्क़-ए-हुस्न की
यूँ ख़ाक कर दिया है कि सहरा कहें जिसे

फिर जोश पर है सीना-ए-महज़ूँ में आज-कल
इक शौक़ मौजा-ए-लब-ए-दरिया कहें जिसे

फिर उन लबों पे आज है इक इर्ति'आश-ए-हुस्न
मेरे वुफ़ूर-ए-शौक़ का नक़्शा कहें जिसे

अब दिल को आरज़ू है कि उन की निगाह-ए-नाज़
इक दर्द दे कि ग़म का मुदावा कहें जिसे

अक्सर हवा-ए-रिफ़'अत-ए-परवाज़ में 'जलील'
तय कर गया हूँ औज-ए-सुरय्या कहें जिसे