उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo ek lamha jise jawedan kaha jae

वो एक लम्हा जिसे जावेदाँ कहा जाए

وہ ایک لمحہ جسے جاوداں کہا جائے

शायर: Panna Lal Noor9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो एक लम्हा जिसे जावेदाँ कहा जाए
मिले तो हासिल-ए-उम्र-ए-रवाँ कहा जाए

उन्हीं से रूह को फ़रहत उन्हीं से दिल को क़रार
वो हादसात जिन्हें जाँ-सिताँ कहा जाए

इसी में चंद मोहब्बत के दिन भी शामिल हैं
तमाम उम्र को क्यों राएगाँ कहा जाए

मिरे नसीब में लिखे न जा सके तुम से
वो चार तिनके जिन्हें आशियाँ कहा जाए

मिरे हुजूम-ए-तमन्ना की आख़िरी मंज़िल
बस एक मर्ग जिसे ना-गहाँ कहा जाए

अदा-ए-तमकनत-ए-हुस्न का तक़ाज़ा है
हर इक सितम पे उन्हें मेहरबाँ कहा जाए

हर एक क़तरे में सौ सौ हिकायतें होंगी
हज़ार दीदा-ए-तर बे-ज़बाँ कहा जाए

हरीम-ए-दिल में कहीं रह गई ख़लिश बन कर
किसी की याद जिसे नीश-ए-जाँ कहा जाए

हमारे अश्क ही जब 'नूर' रख सके न भरम
फिर और किस को भला राज़दाँ कहा जाए