उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo aise pesh aaya mujhse jaise jaanta nahin

वो ऐसे पेश आया मुझ से जैसे जानता नहीं

وہ ایسے پیش آیا مجھ سے جیسے جانتا نہیں

शायर: Gaazi Moin6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो ऐसे पेश आया मुझ से जैसे जानता नहीं
अगरचे नाम उस का मैं कभी भी भूलता नहीं

ये दिल भी है के उस की बेवफ़ाई मानता नहीं
मगर सिवाए उस के अब किसी से राब्ता नहीं

वो जादूगर है लफ़्ज़ों का तू उस से दूर रहना सीख
उस आदमी के बारे में अभी तू जानता नहीं

मुक़द्दर अपना गर बिछड़ना ही हुआ तो ठीक है
मिरी नज़र में अब बिछड़ना कोई हादिसा नहीं

यहाँ तो ग़म की बोलियाँ लगाई जाती हैं मियाँ
तुम्हारे दर्द से यहाँ कोई भी आश्ना नहीं

कि मेरा ख़्वाब भी है वो मिरा ख़याल भी है वो
ये सच है 'ग़ाज़ी' भूल कर भी उस को भूलता नहीं