उर्दू शायरी · ग़ज़ल

visal-e-yar bhi hai daur mein sharab bhi hai

विसाल-ए-यार भी है दौर में शराब भी है

وصال یار بھی ہے دور میں شراب بھی ہے

शायर: Jaleel Manikpuri8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

विसाल-ए-यार भी है दौर में शराब भी है
क़मर भी है मिरे पहलू में आफ़्ताब भी है

ये हुस्न की नहीं जादूगरी तो फिर क्या है
कि तेरी आँख में शोख़ी भी है हिजाब भी है

किसी को ताब कहाँ है कि तुझ को देख सके
जो नूर है तिरे रुख़ पर वही नक़ाब भी है

सुबूत-ए-इश्क़ को ये दो गवाह काफ़ी हैं
जिगर में दाग़ भी है दिल में इज़्तिराब भी है

ग़ुरूर-ए-हुस्न तुझे जिस क़दर हो ज़ेबा है
ख़ुदा के फ़ज़्ल से सूरत भी है शबाब भी है

सितम की चाल सितम की अदा सितम की निगाह
तिरे सितम का सितमगर कोई हिसाब भी है

मिरे लिए नहीं पीने की कुछ कमी साक़ी
कि चश्म-ए-मस्त भी है साग़र-ए-शराब भी है

'जलील' ने तुम्हें चाहा तो क्या गुनाह किया
तुम्हीं बताओ तुम्हारा कोई जवाब भी है