उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wasl ki aarzu kiye na bani

वस्ल की आरज़ू किए न बनी

وصل کی آرزو کئے نہ بنی

शायर: Dagh Dehlvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वस्ल की आरज़ू किए न बनी
न बनी जुस्तुजू किए न बनी

शौक़ ने हम-कलाम कर ही दिया
उन से बे-गुफ़्तुगू किए न बनी

जब रुका ख़ून बन गई दम पर
चाक-ए-दिल को रफ़ू किए न बनी

ज़िल्लत-ए-इश्क़ है वहाँ इज़्ज़त
शिकवा-ए-आबरू किए न बनी

पाक होना है रिंद को लाज़िम
मय-कशी बे-वुज़ू किए न बनी

क़त्ल ठहरा जो शेवा-ए-मा'शूक़
हमें दिल को लहू किए न बनी

उस की तस्वीर से भी था ये ख़ौफ़
'दाग़' को गुफ़्तुगू किए न बनी