उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wasl ka intizam karte hain

वस्ल का इंतिज़ाम करते हैं

وصل کا انتظام کرتے ہیں

शायर: Tabrez Hasan Raazii5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वस्ल का इंतिज़ाम करते हैं
हिज्र का इख़्तिताम करते हैं

कब तलक यूँ जुदा जुदा ही रहें
साथ अब कोई शाम करते हैं

होती उन में अना नहीं बिल्कुल
ख़ुद जो बढ़ कर सलाम करते हैं

मस्जिदों में बड़ा न छोटा कोई
साथ ही सब कलाम करते हैं

ये शिकायत है कि मोहब्बत से
'राज़ी' सब को ग़ुलाम करते हैं