उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sirf apna KHasara karte hain

सिर्फ़ अपना ख़सारा करते हैं

صرف اپنا خسارہ کرتے ہیں

शायर: Tabrez Hasan Raazii7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सिर्फ़ अपना ख़सारा करते हैं
'इश्क़ जो भी दुबारा करते हैं

अब मोहब्बत नहीं कोई करता
वक़्त ही सब गुज़ारा करते हैं

लगती है जब कमी किसी में फिर
आइना हम निहारा करते हैं

साथ थे तुम तो ख़ुश ही रहते थे
अब तो ग़म में गुज़ारा करते हैं

यूँ कोई याद तक नहीं करता
काम हो तो पुकारा करते हैं

आग लगती है घर पे उन के भी
दूर से जो नज़ारा करते हैं

है किसी से गिला नहीं 'राज़ी'
ख़ुद पे ग़ुस्सा उतारा करते हैं