उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab kisi ko manana paDta hai

जब किसी को मनाना पड़ता है

جب کسی کو منانا پڑتا ہے

शायर: Tabrez Hasan Raazii8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब किसी को मनाना पड़ता है
अपना सब कुछ गँवाना पड़ता है

क़ैस कैसे कोई भी कहलाए
दश्त में ख़ाक उड़ाना पड़ता है

ख़्वाब दफ़नाने पड़ते हैं अपने
ख़ुद से जब घर चलाना पड़ता है

कल को बेहतर बनाने के लिए अब
अपना माज़ी भुलाना पड़ता है

चीख़ती है ख़मोशी जब अंदर
शोर बाहर मचाना पड़ता है

यूँही रहगीर कौन कहलाए
रह से पत्थर हटाना पड़ता है

कोई हमदर्द भी नहीं ख़ुद ही
बोझ ग़म का उठाना पड़ता है

जब 'इबादत की बात हो 'राज़ी'
सर वफ़ा में झुकाना पड़ता है