उर्दू शायरी · ग़ज़ल

main likhun bhi to uski shan mein kya

मैं लिखूँ भी तो उस की शान में क्या

میں لکھوں بھی تو اس کی شان میں کیا

शायर: Tabrez Hasan Raazii7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मैं लिखूँ भी तो उस की शान में क्या
है कोई उस सा इस जहान में क्या

दिल से बे-घर जो कर दिया मुझ को
आ गया कोई इस मकान में क्या

मैं बिछड़ कर जो तुझ से बिछड़ा नहीं
रह गया हूँ मैं दरमियान में क्या

बोलते हो तो होती है तकलीफ़
है फ़क़त ज़हर ही ज़बान में क्या

है कोई भी नहीं सुकूँ से यहाँ
एक तू ही है इम्तिहान में क्या

मुझ पे अब तुम जो वार करते नहीं
तीर अब है नहीं कमान में क्या

सुन के 'राज़ी' के क़िस्से रोए नहीं
दर्द कम थे मिरे बयान में क्या