उर्दू शायरी · ग़ज़ल

waqt zalim ne mulaqat nahin hone di

वक़्त ज़ालिम ने मुलाक़ात नहीं होने दी

وقت ظالم نے ملاقات نہیں ہونے دی

शायर: Dashmesh Gill Firoze8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वक़्त ज़ालिम ने मुलाक़ात नहीं होने दी
ख़ुद से इक पल भी मिरी बात नहीं होने दी

उस की सीलन मिरे सीने में जमी है अब तक
मेरी आँखों ने जो बरसात नहीं होने दी

तेरे हर ज़ख़्म को ग़ज़लों में पिरो रक्खा है
मैं ने ज़ाए' तिरी सौग़ात नहीं होने दी

नज़्र-ए-आतिश किया हर शाम नया घर कोई
हम ने बस्ती में कभी रात नहीं होने दी

मेरे पत्ते भी मिरे साथ लड़े पतझड़ से
मेरे लश्कर ने मिरी मात नहीं होने दी

घेर ली चंद परिंदों ने ज़मीन-ए-गुलशन
उस पे ता'मीर 'इमारात नहीं होने दी

सर को झुकने न दिया हर किसी दर पर हम ने
सरकशी नज़्र-ए-रूसूमात नहीं होने दी

तुझ से वा'दा था सो सीने में जलन होते हुए
शाम-ए-ग़म ग़र्क़-ए-ख़राबात नहीं होने दी