उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mar ke bhi ku-e-salib-o-dar se uTThe nahin

मर के भी कू-ए-सलीब-ओ-दार से उठ्ठे नहीं

مر کے بھی کوئے صلیب و دار سے اٹھے نہیں

शायर: Dashmesh Gill Firoze5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मर के भी कू-ए-सलीब-ओ-दार से उठ्ठे नहीं
बिक गया सब फिर भी हम बाज़ार से उठ्ठे नहीं

एक ग़म ऐसा कि जो ग़म-ख़्वार से उठ्ठे नहीं
और दवा ऐसी कि जो बीमार से उठ्ठे नहीं

क़त्ल की अपने ख़बर छपवा नहीं ली जब तलक
तब तलक हम दफ़्तर-ए-अख़बार से उठ्ठे नहीं

हार जाने के सभी इल्ज़ाम उन के सर गए
चंद लाशे जो सिपह-सालार से उठ्ठे नहीं

आप के दुख भी नहीं बाँटे गए तो क्या हुआ
कुछ मिरे ग़म भी मिरे ग़म-ख़्वार से उठ्ठे नहीं