उर्दू शायरी · ग़ज़ल

waqt-e-sahar ek aisi uThi raushni ki bas

वक़्त-ए-सहर इक ऐसी उठी रौशनी कि बस

وقت سحر اک ایسی اٹھی روشنی کہ بس

शायर: Tahir Hanfi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

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वक़्त-ए-सहर इक ऐसी उठी रौशनी कि बस
जिस आँख ने भी देखा यूँ चुँधिया गई कि बस

जी भर के इस के बाद किया रक़्स मौत ने
जागे हुओं को सुब्ह को नींद आ गई कि बस

वहशत मिरे मिज़ाज का हिस्सा न बन सकी
पुरवाइयाँ समेट के कहने लगी कि बस

मुझ पे करम तो होता रहा रब का बार बार
बा-वस्फ़ उस के शर्म जो आती रही कि बस

बिल-आख़िर अपनी आँखों से जारी लहू हुआ
हर सानहे पे आँख यूँ रोती रही कि बस

'ताहिर' लिया न भूल के जीने का नाम भी
ऐसे बसर हमारी हुई ज़िंदगी कि बस