उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dharti bhi sina-zan hai ki sachchai chhin li

धरती भी सीना-ज़न है कि सच्चाई छीन ली

دھرتی بھی سینہ زن ہے کہ سچائی چھین لی

शायर: Tahir Hanfi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

धरती भी सीना-ज़न है कि सच्चाई छीन ली
बारिश की जल-तरंग ने तन्हाई छीन ली

ना-बीना बेचता है बसारत को राह में
गूँगे ने जब से नुत्क़-ए-पज़ीराई छीन ली

हम लोग भूक प्यास की शिद्दत न सह सके
फ़ाक़ों ने हम से क़ुव्वत-ए-गोयाई छीन ली

ये किस ने चाँदनी को समेटा है आँख में
ये किस ने सारे शहर की बीनाई छीन ली

पानी पे तैरता रहा रंगों का रक़्स भी
आब-ए-शिफ़ा तो मिल गया ज़ेबाई छीन ली

अब के मुझे मिला है मोहब्बत में ऐसा दुख
चेहरे से जिस ने दिलकशी रा'नाई छीन ली

उतरा है ऐसे आँख में 'ताहिर' ये रतजगा
दलदल को रौंद डाला गया काई छीन ली