उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dariya ruka hua tha magar main safar mein tha

दरिया रुका हुआ था मगर मैं सफ़र में था

دریا رکا ہوا تھا مگر میں سفر میں تھا

शायर: Tahir Hanfi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दरिया रुका हुआ था मगर मैं सफ़र में था
इक रौशनी का अक्स भी मेरे हुनर में था

ओढ़ा हुआ था सच का लबादा वजूद ने
लेकिन शुऊ'र झूट के अंधे नगर में था

हर रास्ते की धूल परों में समेट कर
अंजान मंज़िलों का परिंदा सफ़र में था

बाज़ार में थी हँसते चराग़ों की रौशनी
बुझते हुए दिए का धुआँ मेरे घर में था

कंदा था ख़्वाहिशों का फ़साना फ़सील पर
ज़िंदा हक़ीक़तों का लहू इक खंडर में था

उतरी थी रात शहर में आँसू लिए हुए
इक क़ाफ़िला सहर का कहीं रहगुज़ार में था

'ताहिर' मिरे वजूद की बोली तो दे गया
शायद वो अपनी ज़ात के नीलाम-घर में था