उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wahshat ki mari aankhon ne dil ke shahr ko pur-KHun dekha

वहशत की मारी आँखों ने दिल के शहर को पुर-ख़ूँ देखा

وحشت کی ماری آنکھوں نے دل کے شہر کو پرخوں دیکھا

शायर: Yasir Iqbal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वहशत की मारी आँखों ने दिल के शहर को पुर-ख़ूँ देखा
शीशा-ए-ख़्वाब से यूँ पथराईं कि देर तलक फिर गर्दूं देखा

घुन के घरों के गुन गाओ हम उन की हिफ़ाज़त में पिसते हैं
कीड़ो मकोड़ो तुम्हारी मजाल कि तुम ने हमारा गेहूँ देखा

जिस काया छत्तर-छाया ने धूपों के धारे ग़लत किए
हँसते बस्ते पागल ने उस बादल से बाहर क्यों देखा

चन्द्रमुखी सुब्हों को तड़पी शामों को सूरज-मुखी रोई
रोज़-ओ-शब के आईने को हम ने हमेशा दिगर-गूँ देखा

सखियों अल्लह-रखियों ने बस ता'बीरों की धूल उड़ाई
मैं ने पूरे होश-ओ-हवास में धुंद के पार हुमायूँ देखा

कैसी रसीली कैसी कटीली ओक पे अपनी प्यासी नज़र थी
जूँ गन्ने की पोरें देखीं और पोरों में लीमूँ देखा

शा'इर ने दीवार-ए-'अदम से रौज़न-ए-बंदोबस्त निकाला
महबूबा के ईंट बराबर नज़्ज़ारे को जूँ तूँ देखा