उर्दू शायरी · ग़ज़ल

istiqbaal-e-nur kiya rang-ba-rang saliqon se

इस्तिक़बाल-ए-नूर किया रंग-ब-रंग सलीक़ों से

استقبال نور کیا رنگ برنگ سلیقوں سے

शायर: Yasir Iqbal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इस्तिक़बाल-ए-नूर किया रंग-ब-रंग सलीक़ों से
हम ने बरखा देवी को देखा सात तरीक़ों से

नम आँखों का नील-गगन पल भर में घनघोर हुआ
अब पल्लू रुस्वा होगा आँसुओं पर तहक़ीक़ों से

खलियानों की पीलाहट जब चेहरों तक फैल गई
ठंडे दिल भी उलझ पड़े शहद-समान रफ़ीक़ों से

काठ की बस्ती में हर-सू हरा हरा तो दिखता था
कौन कहाँ तक ताज़ा हुआ पूछें किन सिद्दीक़ों से

पैरहनों की लाली से लाल कहाँ लहराना था
हम ने ठंडी आग चखी हज़र किया ज़िंदीक़ों से

जब जब जामुनी होंटों ने इस्मों को इल्हाम किया
हम ने कीसा-ए-बख़्त भरा नई नई तख़्लीक़ों से

रुत के शोख़ पराँदे से जब दो रंग उड़ा बैठी
हम ने बरखा देवी को देखा पाँच तरीक़ों से