उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mustaqbil ki aankh pahan ke durust andaza roe the

मुस्तक़बिल की आँख पहन के दुरुस्त अंदाज़ा रोए थे

مستقبل کی آنکھ پہن کے درست اندازہ روئے تھے

शायर: Yasir Iqbal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुस्तक़बिल की आँख पहन के दुरुस्त अंदाज़ा रोए थे
बासी शहर पे रोने वाले बिल्कुल ताज़ा रोए थे

यादों की ज़म्बील खुली तो चौखट हसरत-नाक हुई
कुछ लम्हे दीवार से लिपटे कुछ दरवाज़ा रोए थे

बरस रही थी बाग़-ए-अदन से छम-छम ग़म की हरियाली
पेड़ फ़लक के दरवाज़े पर यक-आवाज़ा रोए थे

काजल काजल बहते गए थे सुर्ख़ सवेर के डोरे में
आँख में कुछ ख़्वाबों के चेहरे ग़ाज़ा-ग़ाज़ा रोए थे

पीले पात उतर आए थे सब्ज़ किताब के मातम में
कुछ बिखरे औराक़ पे तड़पे कुछ शीराज़ा रोए थे

नस्लों के सैलाब के आगे कोई मुंडेर न ठहरी थी
बस्ती के मुँह-ज़ोर ठिकाने बे-दरवाज़ा रोए थे

किस की शह पर फ़स्ल हँसी थी कौन नसीबे वाला था
हम तो कोरे सहराओं पर बे-ख़म्याज़ा रोए थे