उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aaraish-e-chand pal rahi thi

आराइश-ए-चंद पल रही थी

آرائش چند پل رہی تھی

शायर: Yasir Iqbal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आराइश-ए-चंद पल रही थी
पोशाक-ए-याद गल रही थी

चौखट से दस्त-ए-आरज़ू तक
बर्फ़ीली आग जल रही थी

थर्राते गोश्वारे की लौ
लशकारे से बहल रही थी

तारों की राख सर पे ओढ़े
हिजरत घर से निकल रही थी

हाथों की अध-खिली कहानी
होंटों पर फूल-फल रही थी

वो मौसम गीत का नहीं था
टहनी ज़ेवर बदल रही थी

पेड़ों की राख से परे तक
जिस्मों की जोत जल रही थी