उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hum KHak se uTThe chashm-e-safar mein dasht sanbhaala kisht rakhi

हम ख़ाक से उठ्ठे चश्म-ए-सफ़र में दश्त सँभाला किश्त रखी

ہم خاک سے اٹھے چشم سفر میں دشت سنبھالا کشت رکھی

शायर: Yasir Iqbal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हम ख़ाक से उठ्ठे चश्म-ए-सफ़र में दश्त सँभाला किश्त रखी
वहशत के मुआफ़िक़ संग न था सो शहरिय्यत की ख़िश्त रखी

हर सम्त ज़मीन में तह-दर-तह शजरे के जंगल नक़्श हुए
हम लौह-ओ-क़लम के वारिस थे आसार में सिर्फ़ नविश्त रखी

जब अफ़लातून का अंधा बरगद फैला तो ग़लतान हुआ
सब तन को जवानी काट गई तो ख़ुश्क लबों पर हिश्त रखी

हम ज़र्द किताब के जलतों ने ता'बीरों का हंगाम किया
जब लफ़्ज़ों को सरसब्ज़ किया तो पेश-ए-निगाह बहिश्त रखी

वो अहल-ए-सुलूक तो सहरा में इक चाल चले इक ढाल ढले
हम रस्ता नापने वालों ने क़दमों की जगह बालिश्त रखी

क्या नीव रखें क्या लफ़्ज़ चुनें दीवार-ए-दिल की बात बने
इक सीधी सादी ईंट कही तो उस पुरकार ने ख़िश्त रखी

जब तड़के समय का पात खुला चमकीली ग़ज़ल भी जाग पड़ी
हम ने भी छुअन की मेहमानी में आईने की सरिश्त रखी