उर्दू शायरी · ग़ज़ल

pani ki dariya-pardaz ibarat bhi majhul gai

पानी की दरिया-पर्दाज़ 'इबारत भी मजहूल गई

پانی کی دریا پرداز عبارت بھی مجہول گئی

शायर: Yasir Iqbal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पानी की दरिया-पर्दाज़ 'इबारत भी मजहूल गई
सोतों वाली बेल फूटने झड़ने में मशग़ूल गई

नक़्श-ए-पा-ए-सब्ज़ पे रीझ गए तो ये ज़ंजीर कटी
ज़र्द पाँव की वहशत थी कि सफ़र की कड़ियाँ भूल गई

आवाज़ें रंग-ओ-बू की थीं सो पक थक कर टूट गिरीं
ख़ामोशी की शाख़ भरी सो हस्ब-ए-समा'अत झूल गई

क्या मुत'अद्दी फ़े'ल हुआ मिट्टी की अज़ली तख़्ती पर
बूदश की तसतीर मुसलसल मिटने तक मफ़'ऊल गई

पौद-घरों में शोर उठा दाबों ने कहा हम बाग़ी हैं
गमलों की तहरीक-ए-बाग़ मुंडेरों तक निर्मूल गई

आमद-ए-ख़्वाब-ए-दूर-दराज़ को भालते चेहरे बिखर गए
माह-ओ-साल के झक्कड़ से बस दरवाज़ों तक धूल गई

रौज़न-ए-चश्म के होने से ये नविश्ता नज़र-अंदाज़ हुआ
देखो इस दीवार-ए-दिल की इक इक ईंट फ़ुज़ूल गई