उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wahi shikast-e-safar ka nishan hai chehre par

वही शिकस्त-ए-सफ़र का निशाँ है चेहरे पर

وہی شکست سفر کا نشاں ہے چہرے پر

शायर: Qaisarul Jafri8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वही शिकस्त-ए-सफ़र का निशाँ है चेहरे पर
बहुत ग़ुबार-ए-पस-ए-कारवाँ है चेहरे पर

नज़र उठे भी तो ज़ख़्मों की ताब ला न सके
ये आइना है कि ख़ंजर रवाँ है चेहरे पर

ख़याल-ओ-ख़्वाब के ताजिर ज़बाँ से कुछ न कहें
लिखी तमाम किताब-ए-ज़ियाँ है चेहरे पुर

उम्मीद-ओ-बीम की इक फ़स्ल-ए-राएगाँ हूँ मैं
नज़र में फूल खिले हैं ख़िज़ाँ है चेहरे पर

मलाल-ए-जाँ की हक़ीक़त को क्या छुपाऊँ मैं
कि हर्फ़ हर्फ़ वही दास्ताँ है चेहरे पर

चलो कि उज़्र-ए-सितम की भी क़ैद ख़त्म हुई
जो इक नक़ाब था वो भी कहाँ है चेहरे पर

फिर उस के बाद भी शायद हवा चली होगी
जो गर्द उड़ के पड़ी थी कहाँ है चेहरे पर

छलक रही है दिल-ओ-जाँ की रौशनी 'क़ैसर'
बुझी-बुझी ही सही मेहरबाँ है चेहरे पर