उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aankh rakhte hue tauhin-e-nazar kaun kare

आँख रखते हुए तौहीन-ए-नज़र कौन करे

آنکھ رکھتے ہوئے توہین نظر کون کرے

शायर: Qaisarul Jafri8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आँख रखते हुए तौहीन-ए-नज़र कौन करे
नाव टूटी हुई देखे तो सफ़र कौन करे

सब यहाँ पार उतरने के लिए बैठे हैं
सामना तुंद-हवाओं का मगर कौन करे

लाश बे-गोर-ओ-कफ़न कब से पड़ी है बाहर
सभी क़ातिल हों तो बस्ती में ख़बर कौन करे

लोग जंगल के दरख़्तों को उठा ले गए घर
धूप में जलते परिंदों पे नज़र कौन करे

दूर तक राह में छाया है ख़िज़ाँ का मंज़र
ख़्वाब आँखों में न महके तो सफ़र कौन करे

झिलमिला दे तुझे इक मौज-ए-हवा की आहट
शम्अ-ए-बे-माया तिरे साथ सहर कौन करे

इम्तिहान-ए-दिल-ओ-जाँ है ये मोहब्बत की सलीब
सहल हो मा'रका-ए-शौक़ तो सर कौन करे

आज लफ़्ज़ों का भरम टूट गया है 'क़ैसर'
हम भी नक़्क़ाद हैं तन्क़ीद मगर कौन करे