उर्दू शायरी · ग़ज़ल

azab sa hai dil-e-na-murad par kab se

अज़ाब सा है दिल-ए-ना-मुराद पर कब से

عذاب سا ہے دل نامراد پر کب سے

शायर: Qaisarul Jafri8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अज़ाब सा है दिल-ए-ना-मुराद पर कब से
खड़ा हूँ मैं रविश-ए-गर्द-बाद पर कब से

कभी मिलोगे कहीं तो मिलोगे जीते जी
मैं जी रहा हूँ इसी ए'तिमाद पर कब से

जो बाढ़ आई तो बे-चारा बह गया ख़ुद ही
जो बंद बाँध रहा था फ़साद पर कब से

वो ज़िंदगी जो कभी मुड़ के देखती भी नहीं
मैं मर रहा हूँ उसी बद-निहाद पर कब से

मिरे क़लम पे भी शब-ख़ून पड़ गया आख़िर
मुहासरा था मिरी जाएदाद पर कब से

मैं रौशनी को भुला दूँ तो क्या तअ'ज्जुब है
बरस रहा है धुआँ मेरी याद पर कब से

मिरे वजूद में क्या शाहकार है पिन्हाँ
चढ़ा रहा है ज़माना ख़राद पर कब से

तमाम शहर-ए-समाअ'त लरज़ उठा 'क़ैसर'
निकल पड़ी है ख़मोशी जिहाद पर कब से