उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wahi jo manzil-e-shams-o-qamar mein rahta hai

वही जो मंज़िल-ए-शम्स-ओ-क़मर में रहता है

وہی جو منزل‌ شمس و قمر میں رہتا ہے

शायर: Badr Jamali6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वही जो मंज़िल-ए-शम्स-ओ-क़मर में रहता है
वो हुस्न बन के हमारी नज़र में रहता है

नज़र को अपनी छुपाए हुए हूँ मैं सब से
कि एक पर्दा-नशीं इस नज़र में रहता है

तुम्हारी दीद का अरमाँ जो घट गया दिल में
वो बन के नाला तलाश-ए-असर में रहता है

असीर-ए-ज़ुल्फ़-ए-परीशाँ हूँ इस लिए ऐ दोस्त
मिरा ख़याल हमेशा सफ़र में रहता है

क़फ़स की ज़िंदगी-ए-बे-मज़ा को कब हासिल
जो लुत्फ़ यूरिश-ए-बर्क़-ओ-शरर में रहता है

जिधर निगाह उठाऊँ उसी का अक्स उभरे
उसी का जल्वा 'जमाली' नज़र में रहता है