उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wahi bulandi se niche hamein giraate hain

वही बुलंदी से नीचे हमें गिराते हैं

وہی بلندی سے نیچے ہمیں گراتے ہیں

शायर: Chand Kakralvi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वही बुलंदी से नीचे हमें गिराते हैं
वो जिन के वास्ते हम सीढ़ियाँ बनाते हैं

बिखरने लगते हैं हम को समेटने वाले
कभी कभार तो हम इतना टूट जाते हैं

सुकून मिलता है दिल को इसी वज़ीफ़े से
हम अपने शे'र अकेले में गुनगुनाते हैं

उन्हें सनद नहीं मिलती कभी मोहब्बत में
जो सर बचाते हैं और उँगलियाँ कटाते हैं

अब और इस से ज़ियादा भी रब्त क्या होगा
वो धूप में हों पसीने में हम नहाते हैं

रसाई धूप की होती कहाँ है कमरे में
हमारे कपड़े बदन पर ही सूख जाते हैं