उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hath pahunche bhi na the mahtab tak

हाथ पहुँचे भी न थे महताब तक

ہاتھ پہنچے بھی نہ تھے مہتاب تک

शायर: Chand Kakralvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हाथ पहुँचे भी न थे महताब तक
हो गए मिट्टी सुनहरे ख़्वाब तक

चाल तो दरिया की हम ने रोक दी
आ गई नौबत मगर सैलाब तक

बादलों की मेहरबानी हो गई
वर्ना क्या आती नदी तालाब तक

इस ज़मीं की आब्यारी कैसे हो
कम है जिस की प्यास को सैलाब तक

दुख तो ये है कौड़ियों में बिक गए
कुछ घरों के गौहर-ए-नायाब तक

ख़ैर हो मौला सियासत आ गई
मस्जिदों के मिम्बर-ओ-मेहराब तक

हौसला तिनके का वो भी देख ले
ले चलो मौजो मुझे गिर्दाब तक