उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wadi-e-jism mein bikhraw nahin chahte hain

वादी-ए-जिस्म में बिखराव नहीं चाहते हैं

وادیٔ جسم میں بکھراؤ نہیں چاہتے ہیں

शायर: Faiz Khalilabadi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वादी-ए-जिस्म में बिखराव नहीं चाहते हैं
हम तिरे हाथों कोई घाव नहीं चाहते हैं

क़ैस साहिब की रिवायत से मोहब्बत है मगर
अपने ऊपर कोई पथराव नहीं चाहते हैं

हम मुसाफ़िर हैं मोहब्बत है हमारी मंज़िल
इस सफ़र में कोई ठहराव नहीं चाहते हैं

इसी लहजे से है पहचान अदब में अपनी
इस लिए हम कोई बदलाव नहीं चाहते हैं

गुफ़्तुगू का हमें भरपूर हुनर है मालूम
फिर भी ख़ामोशी से अलगाव नहीं चाहते हैं

ज़िंदगी फूल से नाज़ुक है यही सोच के हम
इस के अंदर कोई उलझाव नहीं चाहते हैं

इस लिए रहते हैं दो-रंगी उसूलों के ख़िलाफ़
एक बाज़ार में दो भाव नहीं चाहते हैं