उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wada-e-ulfat-o-paiman-e-wafa se tauba

वादा-ए-उलफ़त-ओ-पैमान-ए-वफ़ा से तौबा

وعدۂ الفت و پیمان وفا سے توبہ

शायर: Jafar Raza7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वादा-ए-उलफ़त-ओ-पैमान-ए-वफ़ा से तौबा
तजरबा कहता है उस हुस्न-ए-अदा से तौबा

रात तारीक है बेचैनी बढ़ी जाती है
जिस का उल्टा हो असर ऐसी दुआ से तौबा

अपना घर बन गया मक़्तल मगर हम अहल-ए-यकीं
नहीं करते हैं ग़म-ए-होश-रुबा से तौबा

उन की फ़सताई तबीअ'त में है क़त्ल-ओ-ग़ारत
क्यूँ करेंगे वो भला ज़ुल्म-ओ-जफ़ा से तौबा

बिजली चमके तो बहाने से लिपट जाते हैं
फिर वो कहते हैं बड़ी शर्म-ओ-हया से तौबा

चश्म-ए-साक़ी की क़सम था ये बहाना वर्ना
कहीं करते हैं मय-ओ-जाम के प्यासे तौबा

उस ने तो चीर दिया अहल-ए-चमन के दिल को
अब के बल खाई हुई बाद-ए-सबा से तौबा