उर्दू शायरी · ग़ज़ल

utri hai ghar mein dhup gham-e-rozgar ki

उतरी है घर में धूप ग़म-ए-रोज़गार की

اتری ہے گھر میں دھوپ غم روزگار کی

शायर: Raashidul Islaam Ansaarii8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उतरी है घर में धूप ग़म-ए-रोज़गार की
दुनिया का होश है न ख़बर कू-ए-यार की

घर से निकल के बस्ती को देखा न आज तक
ज़ीनत बने हुए हैं मगर इश्तिहार की

ज़ालिम न इस क़दर तू ग़रीबों पे ज़ुल्म कर
बुनियाद हिल न जाए तिरे इक़्तिदार की

लड़ने चले हैं जंग अँधेरों से हम मगर
है रौशनी हमारे घरों में उधार की

हम ने तो दिल निकाल के तोहफ़े में दे दिया
तुम थे कि दुश्मनों की रविश इख़्तियार की

है लब पे ना'रा मशरिक़ी तहज़ीब का मगर
किरदार में चमक है समुंदर के पार की

मग़रूर दुश्मनों को ये पैग़ाम भेज दो
इस बार जंग होगी मगर आर-पार की

'राशिद' अगर हैं फ़िक्र-ओ-'अमल अपने रहनुमा
क्या फ़िक्र है समाज में फिर जीत हार की