उर्दू शायरी · ग़ज़ल

junun-e-gham ki mere azmaten baDha jao

जुनून-ए-ग़म की मिरे 'अज़्मतें बढ़ा जाओ

جنون غم کی مرے عظمتیں بڑھا جاؤ

शायर: Raashidul Islaam Ansaarii8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जुनून-ए-ग़म की मिरे 'अज़्मतें बढ़ा जाओ
जो हो सके तो अचानक ही मुस्कुरा जाओ

ये ऊँच-नीच के सब बाम-ओ-दर गिरा जाओ
निज़ाम ऐसा ज़माने में तुम चला जाओ

दिलों के साज़ पर इक गीत ऐसा गा जाओ
अँधेरे बुग़्ज़-ओ-'अदावत के तुम मिटा जाओ

वो जिन की शाख़ों पे ज़हरीले नाग रहते हों
हवाओ आओ सब ऐसे शजर गिरा जाओ

ये कह रही है नई नस्ल अब बुज़ुर्गों से
ज़मीर-ए-वक़्त को तक़्सीम से बचा जाओ

किसी भी दौर की आँधी गिरा नहीं सकती
लहू से शम'-ए-सदाक़त अगर जला जाओ

बदल सको तो बदल दो निज़ाम को वर्ना
निदा-ए-वक़्त की आग़ोश में समा जाओ

अगरचे बज़्म-ए-सुख़न इम्तिहान है 'राशिद'
अब आ गए हो तो ताज़ा ग़ज़ल सुना जाओ