उर्दू शायरी · ग़ज़ल

shajar patte hawaen bolti hain

शजर पत्ते हवाएँ बोलती हैं

شجر پتے ہوائیں بولتی ہیں

शायर: Raashidul Islaam Ansaarii8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शजर पत्ते हवाएँ बोलती हैं
ये जंगल है बलाएँ बोलती हैं

जहाँ हक़ की अदाएँ बोलती हैं
वहीं पर कर्बलाएँ बोलती हैं

महाज़-ए-जंग पर हैराँ है ज़ालिम
सर-ए-नेज़ा वफ़ाएँ बोलती हैं

हुआ है क़त्ल सहरा में किसी का
हवाएँ साएँ साएँ बोलती हैं

चराग़ों में लहू कम हो न जाए
यहाँ हर दम हवाएँ बोलती हैं

ये लगता है उतर आए फ़रिश्ते
घरों में जब भी माएँ बोलती हैं

सुना है बाज़ बूढ़ा हो गया है
तभी तो फ़ाख़ताएँ बोलती हैं

ज़मीं महव-ए-दु'आ है और 'राशिद'
पहाड़ों पर घटाएँ बोलती हैं