उर्दू शायरी · ग़ज़ल

izzat shohrat ohde mansab daulat ke ambaron mein

'इज़्ज़त शोहरत 'ओहदे मंसब दौलत के अम्बारों में

عزت شہرت عہدے منصب دولت کے انباروں میں

शायर: Raashidul Islaam Ansaarii7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

'इज़्ज़त शोहरत 'ओहदे मंसब दौलत के अम्बारों में
जो चाहो मिल जाएगा वो दुनिया के बाज़ारों में

चाहा था ये राज़ हमारे हम तक ही महदूद रहें
लेकिन अपना चेहरा भी अब शामिल है अख़बारों में

जिन का ईमाँ काली दौलत जिन का शेवा ज़ुल्म-ओ-सितम
ऐसे लोग भी शामिल हैं अब शह्र के 'इज़्ज़त-दारों में

दुनिया वाले जा पहुँचे हैं चाँद सितारों से आगे
लेकिन हम अब भी उलझे हैं आपस की दस्तारों में

मेरे अन्दर तन्हाई का जैसे कोई सहरा है
ख़ुद को तन्हा पाता हूँ मैं भीड़ भरे बाज़ारों में

कल तक जिन को गिनते थे सब बस्ती के सालारों में
आज उन्हीं का ज़िक्र सुना है क़ातिल और ग़द्दारों में

जिस ने मुसलसल फ़ाक़ों में भी हाथ नहीं फैलाया है
'राशिद' ऐसे मुफ़्लिस को तुम लिख देना ख़ुद्दारों में