उर्दू शायरी · ग़ज़ल

be-nam dhaDkanon ke ajab silsile rahe

बे-नाम धड़कनों के 'अजब सिलसिले रहे

بے نام دھڑکنوں کے عجب سلسلے رہے

शायर: Raashidul Islaam Ansaarii7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बे-नाम धड़कनों के 'अजब सिलसिले रहे
हम सो गए कभी तो कभी जागते रहे

ऐ शहर-ए-दिल-नवाज़ ज़रा ये जवाब दे
क्यों पत्थरों से खौफ़ज़दा आइने रहे

हिजरत की ज़र्द शाम का मंज़र न पूछिए
घर छोड़ कर भी घर की तरफ़ देखते रहे

हालाँ कि वो रफ़ीक़-ए-शब-ओ-रोज़ थे मगर
ज़ेहनों के दरमियान बहुत फ़ासले रहे

चढ़ती सदाक़तों की वो बस्ती 'अजीब थी
जो आइना मिज़ाज थे पत्थर बने रहे

कब रेगज़ार-ए-वक़्त में दरिया नहीं रहे
कब पानियों पे देर तलक बुलबुले रहे

'राशिद' हवा के तेज़ दबाओ के बा-वजूद
हम रौशनी की डोर सँभाले हुए रहे