उर्दू शायरी · ग़ज़ल

utna hi dard-e-sar hai ki jitna hi kaam hai

उतना ही दर्द-ए-सर है कि जितना ही काम है

اتنا ہی درد سر ہے کہ جتنا ہی کام ہے

शायर: Zafar Iqbal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उतना ही दर्द-ए-सर है कि जितना ही काम है
ये कारोबार-ए-'इश्क़ अनोखा ही काम है

करते हैं ज़ौक़-ओ-शौक़ से और क्यों नहीं करें
आख़िर तुम्हारा काम भी अपना ही काम है

इस पर भी ए'तिराज़ तुम्हें है वगर्ना हम
जो कुछ भी कर रहे हैं तुम्हारा ही काम है

हर दम हमारा आदमियों से मु'आमला
ये भी तो हर लिहाज़ से कुत्ता ही काम है

अपनी तो बात भी नहीं सुनता यहाँ कोई
और आप का तो शह्र में चलता ही काम है

सीधे सुभाव बात जो करनी पड़े हमें
अपने लिए तो ये भी इक उल्टा ही काम है

झगड़े-फ़साद का कोई इम्काँ नहीं 'ज़फ़र'
या'नी ये कुछ न करना भी अच्छा ही काम है