उर्दू शायरी · ग़ज़ल

uThaya faeda jis ne hamesha be-zabani ka

उठाया फ़ाएदा जिस ने हमेशा बे-ज़बानी का

اٹھایا فائدہ جس نے ہمیشہ بے زبانی کا

शायर: Habiba Ikram7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उठाया फ़ाएदा जिस ने हमेशा बे-ज़बानी का
वही तो मरकज़ी किरदार था मेरी कहानी का

ख़यानत भी न हो पाई थी रोज़ा-दार आँखों से
वो कफ़्फ़ारे में कर बैठे तक़ाज़ा ज़िंदगानी का

सर-ए-तस्लीम ख़म कर दे वो मेरे रू-ब-रू आ कर
अगर एहसास हो जाए मिरी आँखों के पानी का

सर-ए-महफ़िल उसी ने कर दिया बे-आबरू आख़िर
किया करता था जो दा'वा हमारी पासबानी का

लगे हैं दिल पे जितने ज़ख़्म सब नासूर हो जाते
लगा लेती अगर मरहम तुम्हारी मेहरबानी का

सभी कुछ छिन चुका है दर-ब-दर भी हो गए फिर भी
नशा उतरा नहीं ज़ेहनों से अब तक हुक्मरानी का

नहीं देखा गया ये भी 'हबीबा' अहल-ए-दुनिया से
बड़ी मुश्किल से हाथ आया था लम्हा शादमानी का