उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jo aa rahi hai badan se kamal ki KHushbu

जो आ रही है बदन से कमाल की ख़ुशबू

جو آ رہی ہے بدن سے کمال کی خوشبو

शायर: Habiba Ikram6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जो आ रही है बदन से कमाल की ख़ुशबू
मिरी रगों में है रिज़्क़-ए-हलाल की ख़ुशबू

उसी के दम से मो'अत्तर है कारवान-ए-हयात
है मेरे घर में जो अहल-ओ-'अयाल की ख़ुशबू

ज़बाँ पे हैं वही कलमे वही है सोज़ मगर
कहाँ से लाऊँ अज़ान-ए-बिलाल की ख़ुशबू

जिएँगे और कहाँ तक हम अपने माज़ी में
हमें तो चाहिए अब अपने हाल की ख़ुशबू

न आया दिल में किसी और का ख़याल कभी
बसी है जब से तुम्हारे ख़याल की ख़ुशबू

तू अपने फ़ज़्ल-ओ-करम से क़ुबूल कर या-रब
'हबीबा' लाई है दस्त-ए-सवाल की ख़ुशबू