उर्दू शायरी · ग़ज़ल

uTha ke kasa-e-kaun-o-makan sawal kiya

उठा के कासा-ए-कौन-ओ-मकाँ सवाल किया

اٹھا کے کاسۂ کون و مکاں سوال کیا

शायर: Usman Alvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उठा के कासा-ए-कौन-ओ-मकाँ सवाल किया
इस एक बात पे तू ने सब इश्ति'आल किया

क़रीब था कि कोई आइनों में घिर जाता
कहीं से रेत उड़ी और 'अजब कमाल किया

बहार आ के रही ग़ुंचा-ए-तमन्ना में
फिर एक आँख ने रंग-ए-हुनर मिसाल किया

कहीं पे कोई दु'आ ताक़चों में डूब गई
तो शाम-ए-शहर-ए-सफ़र ने बहुत मलाल किया

कोई निगाह थी माने' वगरना कार-ए-जहाँ
गहे गहे न हुआ और ख़ाल-ख़ाल किया

ये कैसा फूल उतरता है सत्ह-ए-दरिया पर
ये किस तलब ने निगाहों का रंग लाल किया

कोई तमन्ना भटकती थी दिल की गलियों में
फिर एक रोज़ उसे भी उधर निकाल किया