उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mawara-e-ram-o-raftar guzarti hui sham

मावरा-ए-रम-ओ-रफ़्तार गुज़रती हुई शाम

ماورائے رم و رفتار گزرتی ہوئی شام

शायर: Usman Alvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मावरा-ए-रम-ओ-रफ़्तार गुज़रती हुई शाम
साँस लेती हुई सीने में उतरती हुई शाम

और से और हुआ जाता रहा रंग-ए-शफ़क़
क्या किसी शाने पे सिमटी है बिखरती हुई शाम

आँख के गिर्द सियाही सी उतर आती हुई
और कहीं दूर बहुत दूर ठहरती हुई शाम

क्या 'इलाक़ा है कि इक जस्त पे मौक़ूफ़ हुआ
क्या ख़बर जी उठे इक आन में मरती हुई शाम

क्या ख़बर है कि मिरे दिल में अचानक आ जाए
और थम जाए ठिठुरती हुई डरती हुई शाम

इस बहाओ में बहे जाने से क्या रोकेगी
इक सियह फूल सा दहलीज़ पे धरती हुई शाम

ख़्वाब-आसार हुए जाने लगे हैं दर-ओ-बाम
कैसी वहशत लिए फिरती है उभरती हुई शाम