उर्दू शायरी · ग़ज़ल

shabnam-zadi jitni teri aankhon mein hariyali hai

शबनम-ज़ादी जितनी तेरी आँखों में हरियाली है

شبنم زادی جتنی تیری آنکھوں میں ہریالی ہے

शायर: Usman Alvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शबनम-ज़ादी जितनी तेरी आँखों में हरियाली है
तेरा सब्ज़े पर न चलना सब्ज़े की पामाली है

किस को मैं ये बात बताऊँ कौन इसे तस्लीम करे
आँगन में पलते साए ने मेरी गेंद चुरा ली है

ख़्वाब की अफ़रातफ़री से निकलूँ तो फ़ैसला कर पाऊँ
किस कोने में बिस्तर डालूँ सारा कमरा ख़ाली है

इतनी आँखें झाँक रही हैं अब सीने के रौज़न से
मौसम इतना सर्द नहीं था जितनी आग जला ली है

जाने बिस्तर का दरवाज़ा कौन नगर को खुलता है
सहरा सहरा घूम चुका हूँ सारी ख़ाक उड़ा ली है

इस गिर्दाब में रहते रहते इतना हुनर तो सीख लिया
इस से पहले एड़ी घूमे हम ने सोच घुमा ली है

इन हाथों ने बदल के रख दी साइंस और रिवायत भी
पत्थर पानी में फेंका और उस से आग निकाली है