उर्दू शायरी · ग़ज़ल

nihaal-e-husn bahut kam samay ka sathi tha

निहाल-ए-हुस्न बहुत कम समय का साथी था

نہال حسن بہت کم سمے کا ساتھی تھا

शायर: Usman Alvi10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

निहाल-ए-हुस्न बहुत कम समय का साथी था
मगर जो नक़्श मिरे आइने का साथी था

बहुत ग़ुरूर से फिरता था मैं जुनूँ-आसार
वो इस लिए कि तिरे क़ाफ़िले का साथी था

मिरी तलब थी मगर सा'अत-ए-यक़ीन तलक
वो कम-निगाह भी दो-आतिशे का साथी था

कि रंग-ए-रफ़्तगी हर वक़्त था निगाहों में
मगर जो शाम के दौरानिए का साथी था

फिर एक रोज़ वो गर्द-ए-शफ़क़ में डूब गया
जो इंतिज़ार किसी ताक़चे का साथी था

मगर वो नींद वो जन्नत का पेश-ख़ेमा नींद
जहाँ पे हर कोई इक दूसरे का साथी था

उसी ने टूट के आँखों में रौशनी भर दी
जो इक सितारा मिरे रतजगे का साथी था

उसे तो चाहिए वो साथ दे सहारा दे
उसे ख़बर है वो अच्छे-बुरे का साथी था

मिरे लिए मिरी बाँहें क़फ़स बनी हुई थीं
मिरे लिए तो अंधेरा दिए का साथी था

ये रज़्म-गाह अबाबील खा गई मेरे
तमाम शहर यहाँ अब्रहे का साथी था