उर्दू शायरी · ग़ज़ल

use pasand hain jo roz-o-shab tamashe hain

उसे पसंद हैं जो रोज़-ओ-शब तमाशे हैं

اسے پسند ہیں جو روز و شب تماشے ہیں

शायर: Yawar Azeem7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उसे पसंद हैं जो रोज़-ओ-शब तमाशे हैं
तमाशबीन की दुनिया ही अब तमाशे हैं

हमारी क़ौम को जब से मिली है आज़ादी
हमारे मुल्क में जारी अजब तमाशे हैं

तुझे तरीक़त-ए-उश्शाक़ की ख़बर ही नहीं
तिरी निगाह में वो चश्म-ओ-लब तमाशे हैं

तमाशा देखने वालों पे सेहर तारी है
तमाशा देखने वाले भी अब तमाशे हैं

बहुत सी आँखों को इस बात की भनक ही नहीं
इधर उधर जो तमाशा-तलब तमाशे हैं

वो शक्ल जब न रही ज़िंदगी के मेले में
फ़ुज़ूल मेरी निगाहों में सब तमाशे हैं

दिल-ओ-निगाह पे इक बोझ बन चुके 'यावर'
जो इन दिनों सर-ए-शहर-ए-अदब तमाशे हैं