उर्दू शायरी · ग़ज़ल

uski har tarz-e-taghaful pe nazar rakhti hai

उस की हर तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल पे नज़र रखती है

اس کی ہر طرز تغافل پہ نظر رکھتی ہے

शायर: Zafar Iqbal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उस की हर तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल पे नज़र रखती है
आँख है दिल तो नहीं सारी ख़बर रखती है

लब तक आएगी मगर आ के पलट जाएगी
टूटा-फूटा सही ये आह भी घर रखती है

दिल से उभरा है जुदाई का चमकता सूरज
रात भी आज तब-ओ-ताब-ए-सहर रखती है

चाँद की चाँदनी देती है क़रार आँखों को
दिल की मौजों को मगर ज़ेर-ओ-ज़बर रखती है

मुझ से आगे हैं मिरे साथ निकलने वाले
इक यही बात मुझे गर्म-ए-सफ़र रखती है

तू ने ऐ मुंतज़िर-ए-मर्ग न सोचा वर्ना
ज़िंदगी भी इसी वादी में गुज़र रखती है

बे-दिली तेरी कोई दम की है मेहमान कि ये
तूदा-ए-बर्फ़ है सीने में शरर रखती है