उर्दू शायरी · ग़ज़ल

un ko phir dekhne ki aas nahin

उन को फिर देखने की आस नहीं

ان کو پھر دیکھنے کی آس نہیں

शायर: Zabih Allahabadi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उन को फिर देखने की आस नहीं
चाक अब दामन-ए-हवास नहीं

मंज़िल-ए-ग़म में साथ है उम्मीद
मेरा चेहरा ज़रा उदास नहीं

फिर क़फ़स छोड़ कर कहाँ जाएँ
जब हवा-ए-चमन ही रास नहीं

क्या उमीद-ए-वफ़ा करे कोई
उन को अपनी ज़बाँ का पास नहीं

आज़माता है ज़र्फ़ को साक़ी
रिंद पी कर भी बद-हवास नहीं

क्या निराली है हश्र की दुनिया
एक से एक रू-शनास नहीं

तंग ख़ुद से मैं आ चुका हूँ 'ज़बीह'
अब कोई शय भी आस-पास नहीं