उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mahshar-e-ummid pahle dil mein paida kijiye

महशर-ए-उम्मीद पहले दिल में पैदा कीजिए

محشر امید پہلے دل میں پیدا کیجئے

शायर: Zabih Allahabadi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

महशर-ए-उम्मीद पहले दिल में पैदा कीजिए
उस का जल्वा देखने की फिर तमन्ना कीजिए

इक नया 'आलम ब-क़द्र-ए-शौक़ पैदा कीजिए
हर नज़र को हुस्न की महव-ए-तमाशा कीजिए

बढ़ते बढ़ते हो गई वहशत मुहीत-ए-काएनात
लुत्फ़ तो जब है कि हर ज़र्रे को सहरा कीजिए

चाहता है वुस'अतें उन का फ़रेब-ए-इल्तिफ़ात
दिल के हर गोशे में पैदा एक दुनिया कीजिए

यूँ नियाज़-ए-'इश्क़ में हो जाए तकमील-ए-वफ़ा
आस्तान-ए-नाज़ के ज़र्रों को सज्दा कीजिए

जल्वा-ए-गुल में दिखाते हैं तजल्ली हुस्न की
देखने वालों से कहते हैं कि देखा कीजिए

झूम कर मयख़ाने पे छाई घटा है ऐ 'ज़बीह'
तोड़ कर अब तौबा शग़्ल-ए-जाम-ओ-मीना कीजिए