उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jaane wale phir na lauTe kuchh to is mein raaz hai

जाने वाले फिर न लौटे कुछ तो इस में राज़ है

جانے والے پھر نہ لوٹے کچھ تو اس میں راز ہے

शायर: Zabih Allahabadi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जाने वाले फिर न लौटे कुछ तो इस में राज़ है
क्या तिलिस्म-ए-ख़ाक में भी जाँ-फ़ज़ा अंदाज़ है

ये तो है मा'लूम दिल में आए हैं तीर-ए-नज़र
ये नहीं मा'लूम लेकिन कौन तीर-अंदाज़ है

कोई समझे या न समझे हम समझते हैं इसे
मौत में सर-बस्ता सारा ज़िंदगी का राज़ है

इब्तिदा-ए-'इश्क़ में दुनिया से हम खोए गए
उस का क्या अंजाम होगा जिस का ये आग़ाज़ है

कितनी दिलकश हैं सदाएँ शीशा-ए-दिल की तिरे
आज तक मानूस कानों को वही आवाज़ है

हर तरफ़ जल्वा नज़र आता है उन के हुस्न का
ये हमारा दिल है या उन का हरीम-ए-नाज़ है

कौन दिल की दास्ताँ मुझ को सुनाता है 'ज़बीह'
ज़र्रा ज़र्रा दश्त का जो गोशा-ए-परवाज़ है