उर्दू शायरी · ग़ज़ल

saqi mai-e-wahdat ka wo jam pila mujhko

साक़ी मय-ए-वहदत का वो जाम पिला मुझ को

ساقی مئے وحدت کا وہ جام پلا مجھ کو

शायर: Zabih Allahabadi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

साक़ी मय-ए-वहदत का वो जाम पिला मुझ को
मिट जाए ख़ुदी दिल से मिल जाए ख़ुदा मुझ को

दुनिया में मिला ज़ाहिद जन्नत का मज़ा मुझ को
हासिल है बहारों में इक कैफ़ नया मुझ को

देखा था तिरा जल्वा जब होश न था मुझ को
अब याद नहीं आता कुछ इस के सिवा मुझ को

ये मरहले तय होंगे दुनिया में मोहब्बत के
पहुँचाएगा मंज़िल तक ख़ुद ज़ौक़-ए-फ़ना मुझ को

क्या उन को सुनाऊँ मैं अफ़्साना-ए-बर्बादी
आती है नज़र इस में कुछ दिल की ख़ता मुझ को

जब अपनी हक़ीक़त को मैं ख़ुद ही नहीं समझा
क्या तेरी ख़बर मुझ को क्या तेरा पता मुझ को

क्या उन का बिगड़ता है सज्दों से 'ज़बीह' अपने
क्यों आँख दिखाते हैं नक़्श-ए-कफ़-ए-पा मुझ को