उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHatm apni gardish-e-ayyam kar ke aae hain

ख़त्म अपनी गर्दिश-ए-अय्याम कर के आए हैं

ختم اپنی گردش ایام کر کے آئے ہیں

शायर: Zabih Allahabadi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़त्म अपनी गर्दिश-ए-अय्याम कर के आए हैं
सुब्ह के निकले हुए जो शाम कर के आए हैं

हुस्न को रुसवा-ए-ख़ास-ओ-'आम कर के आए हैं
'आशिक़ी के नाम को बदनाम कर के आए हैं

क्या कहें दुनिया में क्या क्या काम कर के आए हैं
ज़िंदगी को मूरिद-ए-इल्ज़ाम कर के आए हैं

बूँद भर भी हम ने शीशों में नहीं छोड़ी शराब
महफ़िल-ए-साक़ी में ख़ाली जाम कर के आए हैं

मंज़िल-ए-जानाँ से आए लौट कर जो ना-मुराद
दफ़्न अपनी हसरत-ए-नाकाम कर के आए हैं

इंतिज़ार-ए-हश्र में घबराएँगे क्या अहल-ए-हश्र
अपनी अपनी क़ब्र में आराम कर के आए हैं

आप का सानी नज़र आता नहीं कोई 'ज़बीह'
आप हर बज़्म-ए-सुख़न में नाम कर के आए हैं