उर्दू शायरी · ग़ज़ल

qudrat ne di hai mujhko bahaar-afrin nazar

क़ुदरत ने दी है मुझ को बहार-आफ़रीं नज़र

قدرت نے دی ہے مجھ کو بہار آفریں نظر

शायर: Zabih Allahabadi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क़ुदरत ने दी है मुझ को बहार-आफ़रीं नज़र
कितनी हसीं नज़र है ये कितनी हसीं नज़र

देखी निशान-ए-सज्दे में तस्वीर हुस्न की
रौशन हुई तो बन गई मेरी हसीं नज़र

मदफ़न में हम तो आए थे दुनिया को छोड़ कर
दुनिया इक और आती है ज़ेर-ए-ज़मीं नज़र

छुप कर हिजाब-ए-नाज़ में भी वो न छुप सके
अल्लह रे शौक़-ए-दीद की पहुँची वहीं नज़र

वो आएँ भी तो मैं उन्हें देखूँगा किस तरह
देती नहीं है काम दम-ए-वापसीं नज़र

मजबूरियाँ भी साथ रहीं इख़्तियार में
रहता है दिल में वो मगर आता नहीं नज़र

मैं हाल-ए-बे-ख़ुदी भी कहूँ तुम से क्या 'ज़बीह'
बैठा हुआ कहीं हूँ मगर है कहीं नज़र